मुंबई पवई बंधक कांड: 2 करोड़ डूबे, भूख हड़ताल से टूटा रोहित आर्य, आखिर क्यों बनाया मासूम बच्चों को बंधक?

मुंबई पवई बंधक कांड: कौन था रोहित आर्य? आखिर क्यों उठाया उसने इतना खतरनाक कदम?

मुंबई के पवई इलाके में मंगलवार की शाम अचानक अफरा-तफरी मच गई, जब आरए एक्टिंग स्टूडियो से बच्चों की रोने और मदद मांगने की आवाजें आने लगीं। नीचे सड़क पर भीड़ इकट्ठा हो गई, हर कोई डरा हुआ था—आखिर स्टूडियो के अंदर ऐसा क्या हुआ था? कुछ ही देर में पुलिस मौके पर पहुंची और देखा कि करीब 20 बच्चे एक कमरे में बंधक बनाए गए हैं। बच्चों की आंखों में डर था, और उनके मासूम चेहरे सवाल कर रहे थे — “हमने क्या गलती की?”

पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया, सभी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला और उस युवक को काबू में कर लिया, जिसने ये सब किया था। उसका नाम था रोहित आर्य। लेकिन इस पूरी घटना के पीछे की कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि टूटी उम्मीदों, सरकारी वादों और मानसिक टूटन की दर्दनाक दास्तान है।

कौन था रोहित आर्य?

रोहित आर्य कोई आम व्यक्ति नहीं था। वह पढ़ा-लिखा, समझदार और सामाजिक कार्यों में सक्रिय इंसान माना जाता था। उसने “मेरा स्कूल” और “सुंदर स्कूल” नाम की दो परियोजनाओं पर काम किया था। उसका सपना था कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिले, स्मार्ट क्लासरूम बनें और बच्चों को बेहतर वातावरण मिले।
इसके लिए उसने अपनी मेहनत और निजी निवेश से करीब 2 करोड़ रुपये तक इस प्रोजेक्ट में झोंक दिए। लेकिन जब सरकार की ओर से उसे कोई सहयोग नहीं मिला, तब उसकी जिंदगी का रुख बदल गया।

भूख हड़ताल और टूटी उम्मीदें

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल यानी 2024 में 19 अगस्त को रोहित आर्य ने महाराष्ट्र के तत्कालीन शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की थी।
उसका आरोप था कि उसके प्रोजेक्ट के पैसे सरकार ने रोक लिए हैं और उसका आइडिया चुराकर किसी और को दे दिया गया है।

हड़ताल के दौरान उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उस वक्त मंत्री खुद उससे मिलने गए और वादा किया कि जल्द सब कुछ सुलझा दिया जाएगा।
रोहित ने विश्वास किया, भूख हड़ताल खत्म की, लेकिन जैसा कि अक्सर होता है — वादे हवा में उड़ गए। न पैसा मिला, न प्रोजेक्ट वापस मिला, और न ही किसी ने उसकी बात सुनी।

धीरे-धीरे टूटा एक सपनों का आदमी

भूख हड़ताल के बाद भी रोहित लगातार कोशिश करता रहा। उसने कई बार अधिकारियों से संपर्क किया, पत्र लिखे, मीडिया से गुहार लगाई — पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।
धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी। परिवार के अनुसार, वह रातों को जागकर योजनाओं और नोट्स पर काम करता, कभी-कभी खुद से बातें करता। उसे लगता था कि उसकी मेहनत और ईमानदारी को कुचल दिया गया है।

घटना वाले दिन क्या हुआ?

30 अक्टूबर की सुबह रोहित ने एक नया प्लान बनाया। उसने कुछ बच्चों को विज्ञापन शूट के बहाने आरए एक्टिंग स्टूडियो बुलाया। कहा गया कि उन्हें टीवी ऐड के लिए ऑडिशन देना है।
बच्चे और उनके अभिभावक खुश थे — कौन सोच सकता था कि ये एक खतरनाक जाल है?

स्टूडियो पहुंचने के बाद रोहित ने बच्चों को ऊपर वाले कमरे में भेज दिया और दरवाजा बंद कर लिया। नीचे उसने स्टाफ को बाहर निकाल दिया और स्टूडियो में आग लगाने की धमकी दी।
उसने कहा — “जब तक सरकार मेरी बात नहीं सुनेगी, मैं पीछे नहीं हटूंगा।”

पुलिस को खबर मिलते ही तुरंत कार्रवाई शुरू हुई। करीब एक घंटे की कोशिश के बाद सभी बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन रोहित ने पुलिस पर पेट्रोल फेंकने की कोशिश की।
पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में गोली चलाई — रोहित घायल हुआ और बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

पत्नी की आंखों के सामने बिखर गया संसार

जब रोहित को एंबुलेंस में ले जाया जा रहा था, उसकी पत्नी वहीं खड़ी थी। वह अपने पति की हालत देखकर रो पड़ी।
उसने कहा — “वो गलत नहीं था, बस टूटा हुआ था। उसने किसी का बुरा नहीं चाहा। वो तो बच्चों के लिए कुछ अच्छा करना चाहता था।”
यह शब्द पूरे समाज के लिए एक आईना हैं कि कैसे एक ईमानदार व्यक्ति, जिसे सिर्फ न्याय चाहिए था, सिस्टम की बेरुखी से खतरनाक रास्ता चुनने पर मजबूर हो गया।

आखिर सवाल यह है…

क्या सरकार, अधिकारी और समाज मिलकर ऐसे लोगों की आवाज सुनते हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं?
क्या हर उस इंसान को “अपराधी” कह देना आसान है जो सिस्टम से थक चुका है?
या हमें यह सोचना चाहिए कि कहीं न कहीं हमारी चुप्पी भी उसकी मौत की जिम्मेदार है?

रोहित आर्य की कहानी सिर्फ एक पुलिस एनकाउंटर की खबर नहीं, बल्कि एक “सिस्टम से लड़ते हुए हार चुके सपनों की त्रासदी” है।

वो शायद अपराधी बन गया, लेकिन उसके अंदर का इंसान आखिरी पल तक यह चाहता था कि कोई उसकी बात सुने, कोई उसकी मेहनत का सम्मान करे।
पर अफसोस — जब तक उसकी बात सुनी गई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

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