
जयपुर में दर्दनाक खबर: कजाकिस्तान से लौटे एमबीबीएस छात्र राहुल घोसल्या जिंदगी की जंग हार गए
जयपुर की शाम शनिवार को एक बेहद दर्दनाक खबर लेकर आई। शाहपुरा तहसील के नयाबास गांव के 22 वर्षीय एमबीबीएस छात्र राहुल घोसल्या आखिरकार जिंदगी की लड़ाई हार गए। दिवाली के दिन एयर एंबुलेंस से जयपुर लाए गए राहुल का एसएमएस अस्पताल में इलाज चल रहा था, लेकिन तमाम कोशिशों और दुआओं के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। एसएमएस अस्पताल के अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी ने उनके निधन की पुष्टि की।
राहुल को कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना से एयर एंबुलेंस के जरिए जयपुर लाया गया था। वहां उन्हें 8 अक्टूबर को अचानक ब्रेन हैमरेज हो गया था। डॉक्टरों ने तुरंत वेंटिलेटर पर रखा, लेकिन उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। परिवार ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए भारत लाने का निर्णय लिया और इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास शुरू हुए।
एयर एंबुलेंस से वतन वापसी — उम्मीद की एक किरण
राहुल की स्थिति बेहद नाजुक थी। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी, लेकिन बेटे को बचाने की आस में उन्होंने हर संभव प्रयास किया। इसी दौरान राजस्थान एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (RANA) के अध्यक्ष प्रेम भंडारी सामने आए। उन्होंने भारतीय दूतावास, विदेश मंत्रालय और इंडियन कम्युनिटी वेलफेयर फंड के साथ समन्वय करके एयर एंबुलेंस से राहुल की भारत वापसी की प्रक्रिया को संभव बनाया।
राजस्थान में भाजपा नेता उपेन यादव, पूर्व जिला पार्षद महेंद्र चौधरी, और शाहपुरा विधायक मनीष यादव ने भी आगे बढ़कर सहयोग किया। विधायक यादव ने आर्थिक सहायता प्रदान की और जयपुर प्रशासन से लेकर एयरलिफ्ट की पूरी प्रक्रिया तक सक्रिय भूमिका निभाई।
दिवाली के दिन, जब देशभर में खुशियां मनाई जा रही थीं, उसी समय जयपुर एयरपोर्ट पर राहुल को एयर एंबुलेंस से लाया गया। एयरपोर्ट से एसएमएस अस्पताल तक विशेष मेडिकल टीम ने उन्हें क्रिटिकल केयर एंबुलेंस में सुरक्षा के साथ पहुंचाया। उस वक्त हर किसी के दिल में एक ही दुआ थी—“राहुल को कुछ हो न जाए।”
एसएमएस अस्पताल में लगातार संघर्ष
एसएमएस प्रशासन ने राहुल के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम गठित की थी।
इस टीम में शामिल थे —
- न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. डॉ. दिनेश खंडेलवाल
- एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. निहार शर्मा
- जनरल मेडिसिन के डॉ. जी.एल. धायल
- इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. सतीश मीणा
- अतिरिक्त अधीक्षक नरेंद्र सिंह चौहान
इन सभी डॉक्टरों की निगरानी में इलाज चल रहा था। कॉलेज प्राचार्य डॉ. दीपक माहेश्वरी और अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी खुद इस केस की मॉनिटरिंग कर रहे थे। लेकिन, हाई डोज़ दवाओं के बावजूद राहुल के ब्रेन में कोई न्यूरोलॉजिकल रिस्पॉन्स नहीं मिल रहा था। उनका ब्रेन लंबे समय से निष्क्रिय था और मशीनों के सहारे ही सांसें चल रही थीं।
एक उज्ज्वल भविष्य अधूरा रह गया
राहुल 2021 से कजाकिस्तान के अस्ताना मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे। परिवार का सपना था कि बेटा डॉक्टर बने, गांव का नाम रोशन करे। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
सिर्फ 22 साल की उम्र में, जब कोई छात्र अपनी जिंदगी के सपनों की शुरुआत करता है, तब राहुल मौत से जूझ रहे थे।
उनके दोस्तों और कॉलेज के प्रोफेसरों के मुताबिक, राहुल एक मेहनती और विनम्र छात्र थे। पढ़ाई के साथ-साथ वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते थे। उनके साथी छात्रों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा —
“राहुल हमेशा दूसरों की मदद करने वाला लड़का था, लेकिन किस्मत ने उसे बहुत जल्दी छीन लिया।”
गांव में शोक की लहर
राहुल की मौत की खबर जैसे ही शाहपुरा तहसील के नयाबास गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया। गांव के लोग, रिश्तेदार, और मित्र उनके घर पहुंचने लगे। हर किसी की आंखों में आंसू थे, किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि उनका राहुल अब नहीं रहा।
घर के बाहर शोक जताने वालों की भीड़ लगी रही। मां-बाप की हालत बदहवास थी — वह बार-बार कह रहे थे, “बस एक बार आंखें खोल ले बेटा।”
समाज ने दिखाया एकजुटता का उदाहरण
राहुल की बीमारी और एयरलिफ्ट के दौरान जिस तरह से समाज के विभिन्न वर्गों ने साथ दिया, वह मानवता की मिसाल बन गया। सोशल मीडिया पर “Save Rahul Ghosalya” नाम से कैंपेन चला, जिसमें हजारों लोगों ने दुआएं दीं और आर्थिक सहायता भेजी।
भले ही राहुल अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी ने यह दिखा दिया कि जब एकजुट होकर लोग किसी की मदद करते हैं, तो सीमाएं भी मायने नहीं रखतीं।
अंत में बस एक सन्नाटा
एसएमएस मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने रातभर राहुल को बचाने की कोशिश की, पर अंततः शनिवार को उन्होंने दम तोड़ दिया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, उनके ब्रेन में लंबे समय तक कोई गतिविधि नहीं दिखी और जीवनरक्षक उपकरणों के बावजूद शरीर ने काम करना बंद कर दिया।
राहुल की असमय मृत्यु से न केवल उनका परिवार, बल्कि पूरा राजस्थान गमगीन है।
उनकी कहानी आज हजारों छात्रों, अभिभावकों और नागरिकों के दिलों को छू गई है — एक संघर्ष, एक उम्मीद और आखिरकार एक दर्दनाक अंत की कहानी।